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गेवाड़ घाटी

Wednesday, December 9, 2015

मेरा पागलपन

गुण तो सागलों में होते हैं
यह पागल तो अवगुणों की खान हैं ।
गुण होते तो पागल न होता
अवगुण हैं इसीलिए पागल हूँ ।

लक्षण

रंग अगर डाले कोई तो
रंगीन हो लिया करता हूँ
दो बोल मीठा गर बोले कोई तो
शहद पर मधुमखी बन चिपक जाता  हूँ

नजरें चुराए अगर कोई तो
सिसोण झपका देता हूँ
बुरी नजर गढ़ाए गर कोई तो
डांसी ढुंग बरसा देता हूँ

सुन ले ठेकुली तू भी
कब तक आँख मिचोली खेलोगी
पागल हूँ पागलपन की हद्द तक जाऊंगा
हार कभी न मानी थी, न कभी मानूँगा
पागल हूँ जिस कोने में छुपी होगी
उस कोने से ढूंढ़ निकलालुंग 

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