कैंकें बतुं आपु पीड़ा
समझण कोई नि चान,
सब आपुण काम में मस्त हैरिन
कैंकें बतुं आपु पीड़ा।
म्यर पहड्क ठंडी हवा
ठंडो मिठो पाणी
याद उणे पहाड्की
कैंकें बतुं आपु पीड़ा।
गौं बाखेय में जी
सब दगडी मिल-झूली
अपु हाल सुनुछी
याद उने घरकी
कैकें बतुं आपु पीड़ा ।
आज आपुण घर जानु
मित्र ना बंधू ना
वार ना पार ना
सबुले छोड़ी पहाड़
कैंकें बतुं आपु पीड़ा ।
हे देवा !
म्यर पहाड़ कस रूप हैगो
तू ही सबुकें सुनणी
तू ही य पहाड़ कें सँवार सकछे
और कैंकें बतुं आपु पीड़ा
कैंकें बतुं आपु पीड़ा ।




