Tuesday, July 12, 2016

मजा ही कुछ और है

पहाड़ में लोटपोट होने का
मजा ही कुछ और है
हिनोय खेलने का
ग्ध्यर में नहाने का
सिसोणक बुज में घुरिने का
मजा ही कुछ औरहै
धोपरी घाम में
आमक बोट में हिलोय्ने का
ककड़ी  चोरने का
मैन्सुं बोट में लम्थर मारने का
मजा ही कुछ और है
ब्यव को रामलीला देखने का
छिलुक बायबेर देखने का
और
लुट से घा पु चुराकर जलाने का मजा ही कुछ और है -भास्कर जोशी

कविता

ज्ञान वहाँ होता है
जहाँ संस्कार होते हैं
संस्कार वहाँ होता है
जहाँ माँ होती है

माँ वहाँ होती है
जहाँ घर होता है
जहाँ घर होता है
वहीं स्वर्ग होता है

लेकिन आजकल स्वर्ग
आश्रमों के नर्क में है
क्योंकि माँ
वहीं तड़पती, रोती हुई पाई जाती है।
-भास्कर जोशी

सपना (स्वेण)

बेई ब्याव को मैंने के भल क स्वेण् देखा था। ओइजा कत्थब पुज गया ठहरा मैं। पैली तो बहुत देर तक पैदल चलता रहा,  चलते चलते य लोक से उ लोक पहुँच गया। उ लोक पहुँचते ही वां बड् भारि शीश महल देखा। लुकी लुकी के  मैं भतेर पहुंचा तो देखा वहां कोई नहीं। लेकिन भाई देखकर तो हैरान हो गया सोचने लगा कास यह महल मेरा होता। तभी इतने में एक आवाज गूंजी आइये आईये आपका स्वागत है आपका स्वागत। दै बज्जर में चट्ट करके लुकी गया। मुझे लगा कोई ठुल मैस आ रहा होगा उसी का स्वागत कर रहे होंगे सायद । तभी फिर आवाज आई "आप छिप क्यों रहे हैं यह महल आपका ही" मैंने अपनी मुंडी थोडा  बहार निकालकर देखा तो सुंदर सुंदर  अफ्सरायें अतिथि सत्कार के लिए फूल माला लिए खड़े थे  निचे से ऊपर को उनका सौंदर्य देख रहा था मुखडी तक पहुँचने ही वाला था कि एक आवाज आई "जोशी जी ओ जोशी जी 8 बज गए आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?
दै मचेत झस जस हुई चदम्म् उठा हबड़ तबड में सब काम निपटाकर ऑफिस चल दिया। -भास्कर जोशी

कविता

बलुवा त्यार कपाव में
कास यूँ घन्तर पड़ा
जो दिखाई नि दिनाय
पर खुन्यो कर जाणई।

महंगाई कम हैगो कुनेयी
कधिने जीरो हैं जां त्
कधिने ख्वर् पड़ जां
आज्याल स्वर्ग बटी चै रौ।

 बलुवा रे झुंगर मडुवा तू नि खान कुनि है
दाव भात ग्युं रवाट् तिगें चैन हया
काम तू के नि करनि भये रे
स्वेण् तू टाटा अम्बानी जस देखनी भये।

कविता

आपको क्या लगा
गधेरे के चोर
अब सरीफ हो गए
अरे अब तो वे
सरे आम
खुल्लम खुल्ला
चोरी करते हैं
और पेश करते हैं
अपने आपको
जनता का चाहने वाला।
साहब आप कितना भी
पाउडर चपोड़ लो
मगर अंदर से तुम्हारे
बुकणेन् कालेपन की
बु आती है साहब -भास्कर जोशी

एक घन्तर दिल्ली के नाम


दिल्ली जैसा मज़ाक़ कहीं और न हो। यह एसा मज़ाक़ है जो खेल खेल में गधे को कुर्सी थमा दी। अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री अपने  कामों का ब्यौरा विज्ञापन के ज़रिए देते हैं ताकि लोगों तक उनके कामों का हिसाब किताब पहुँचजा सके। लेकिन इधर दिल्ली में ठीक इसके उलट है यहाँ कामों का ब्यौरा नहीं दिया जाता बल्कि अपने नौटंकीपन के चरम पर पहुँचकर जनता द्वारा दिए गये टेक्स का विज्ञापन के ज़रिए ग़लत उपयोग किया जाता है।

एक वर्ष बीत जाने के बाद भी दिल्ली की मौजूदा सरकार ने प्रधानमंत्री जी के शिकायतों की पोटालि बाँध कर रखी है सायद यहीं पिछले एक साल का "आप सरकार" के काम का लेखा जोखा हो। आप सरकार ने क़सम ली हुई है कि हम जनता के लिए कुछ काम नहीं करेंगे। अगर काम करेंगे तो सिर्फ़ प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ झूठी विज्ञापन निकलेंगे।

दिल्ली में अब तक क्या काम हुवा है यह तो आप ही जानते हैं जनता सिर्फ़ मुँह ताक रही है कि आप कुछ कर दें। जतने वादे आप ने चुनाव के द्वारान किए थे सायद ही कोई पूरा हुवा हो। शीलादीक्षित को जेल भेजने के लिए बड़े बड़े कारनामे किए यही कारण है कि आज आप नेता एक एक कर जेल जा रहे हैं शीला दीक्षित को तो भेज ना सके पर हाँ अब वे ख़ुद ही जेल की ओर रूख करने लगे हैं। इन सबके बीच आप सरकार की नीति साफ़ रही है कि वे जनता की सेवा के लिए नहीं बल्कि अपनी सत्ता की लालसा को जीने के लिए आए हैं तथा काम न कर मोदी साहब को कोसना ही आप का परम धर्म नज़र आता है।

इस नेक काम के लिए आप सरकार का बहुत बहुत धन्यवाद। आसा करता हूँ कि आप आगे भी पंजाब  व अन्य राज्यों में भी एसी ही गंध फैलाएँगे।
धन्यवाद
एक
सामान्य वोटर

कविता

ये वही लिंडुर है साहब
जो कल तक
देश भक्ति के गीत गाते थे
फिर इन्होंने
समाज सेवा के नाम पर
जनता को ठगने का बीड़ा उठाया
वाह वाही बटोरी
नेताओं के आगे पिच्छू
चमचागिरी की
और आज दीमक की तरह
हमारे सर पर बैठे हैं ।
आइये साहब आइये
देश की बाग़ डोर
निर्दोषो के खून से रंगे हुए
 आपके हाथों में हैं
आप ही सच्चे देश भक्त हैं
आप ही जनता के सेवक हैं
आपको सत् सत् नमन।।
भास्कर जोशी

गेवाड़ घाटी