Sunday, January 17, 2016

उत्तरखंडक ठेकेदार

जनवरी 2016 स्टेट एजेंडा पत्रिका में प्रकाशित 
ल्यो कर ल्यो बात
ऐ गईं उत्तराखंडक ठेकेदार
तलि बटी मलि तक
सुकिलो कफन पैरी छें
और उत्तराखंड कें
समशान पहुँचौणे लीजि तैयार छें

पांच साल में एक बार औनी
गौं-गौनु में भीख मांगनी
भीख मांग बेर भकार भरनी
भकार भरि बेर पम्म उगानी
और जनतागणि टाटा बाय-बाय कबेर
पछिल बाट् सर्रर्र खसिक जानी।

पांच साल बाद फिर लौट बेर ऊनि
नई-नई स्किम सुणे बेर  भ्रम कर जानी
वोटक लिजी शराबक बोतल दगड नोट बाँट जानी
शराब पिबेर मेंस, मुनव उन्हां खुट स्वर्गहैं ताणी रौनी
घर में नानतिन बौज्यु राशन ल्याल कबेर बाट-बाटे आँख ताणी रौनी
यास विकास पहाड़ में जो कर जानी
उनुहुणि त नेता कौनी। प.भ.जो.

Monday, January 11, 2016

समृति

ये पागल पहाड़ी  के साथ भी ना , न जाने कैसी कैसी घटनाएं घटती हैं । अब उस दिन की ही बात लेलो। ये लमतम होकर लेटा ठहरा। तभी फ़ोन की घंटी बजी....अरे पागल तेरा फोन आया...अरे पागल तेरा फोन आया....जबकि  इसीने अपने फोन में, अपनी आवाज की ऑडियो बनाकर रिकॉड की थी,  उसे ही रिंगटोन बना डाली।...फोन उठाया.....हेल्लो ! जी पागल बोल रहा हूँ उधर से आवाज आई नमस्कार पागल जी...में शेल्स प्रोडक्ट मेनेजर ढिमकणा  बोल रहा हूँ। ..जी कहिये आपने कैसे याद किया?
शेल्स मेनेजर-  पागल जी मैं आपसे मिलकर कुछ बात करना चाहता हूँ । एक काम को अंजाम देना चाहता हूँ जिसमें आपकी मदद चाहिए
पागल- जी कहिये में आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?
मेनेजर- जी अभी में दिल्ली बाहर हूँ दिल्ली आते ही फोन करता हूँ
पागल- जी बिलकुल सेवा के लिए तत्पर हैं ।
शेल्श मेनेजर की उम्र कोई  45-46  की रही होगी
दो चार दिन बाद फिर वही नंबर से फ़ोन की घंटी बजी..पागल तेरा फोन आया..पागल तेरा फोन आया।
हेल्लो! जी पागल बोल रहा हूँ
मेनेजर-जी पागल जी मैं ढिमकणा मेनेजर बोल रहा हूँ । पहले भी आपसे बात हुई थी।
पागल- जी जी मेनेजर साहब कहिये।
मेनेजर - पागल जी मैं आपसे मिलना चाहता हूँ बताइये कैसे मिल सकते हैं
पागल- जी आप बताईये आप उमर से बड़े हैं कहाँ और कैसे मिल सकते हैं।
मेनेजर- जी फिर तो हम रविवार को अपने ही ऑफिस में बैठकर बात कर सकते हैं ।
पागल- जी बिलकुल मैं आता हूँ ।
रविवार का दिन था। और यह पागल चल पड़ा मेनेजर से मिलने के लिए। और यही सोच रहा था कि अपनों के लिए यह व्यक्ति कितना संवेदनशील है|
मेनेजर ऑफिस के बाहर से पागल ने फोन किया । उधर से आवाज आई ......जी पागल जी आप कहाँ पहुंचे
पागल-जी आपके ऑफिस के सामने खड़ा हूँ ।
मेनेजर- जी वहीँ पर ठहरिये मैं आ रहा हूँ आपको लेने ।
पागल वहीँ सामने मेनेजर का इंतजार कर रहा था। ऑफिस का दरवाजा खुला और मेनेजर बाहर निकल कर आये। बोले आप ही पागल जी हैं ?
पागल- जी मैं ही पागल हूँ
मेनेजर- जी आइये अंदर चलकर बात करते हैं
दोनों अंदर गए । मेनेजर और पागल  आमने सामने होकर सोफे पर बैठ गए।
पागल - जी कहिये आपने किस  काम के लिए बुलाया?
मेनेजर- पागल जी आप तो पहाड़ की स्थिति से परिचित हैं वहां न ही रोजगार न ही कोई अन्य  साधन।
पागल- इसमें नयां क्या है? यह तो पहले से ही है अगर रोजगार के साधन होते तो लोग अपने गांव से पलायन क्यों करते। अच्छा सीधे-सीधे बताइये आप गांव के लिए  क्या चाहते हैं
मेनेजर- मैं चाहता हूँ गांव के लोगों को रोजगार मिल सके|
पागल-वो कैसे?
मेनेजर- देखिये ये हमारा प्रोडक्ट है इसमें घर के सामान से लेकर व्यक्तिगत प्रोडक्ट भी हमारे पास है।
पागल- अच्छा जी। इसमें आपके पास क्या क्या सामान है।
मेनेजर- दाल पानी तेल से लेकर क्रीम पाउडर व बहुत कुछ।
क्रीम पाउडर से इस पागल को पहले से ही चिड होती है क्योंकि जो उस ऊपर वाले ने दिया है लोग उसपर संतुष्ट न होकर क्या क्या कीचड़ पट्टी चहरे पर लिपा पोती  कर अपने को स्मार्टनस समझ बैठते हैं
पागल-तो आप पहाड़ में लिपा पोती का  सामान सप्लाय करना चाहते हैं ।
मेनेजर- जी हाँ! क्या गाँव के लोगों को ये अधिकार नही कि वे सज सवंरकर कर रहें |
पागल- जी बिलकुल है लेकिन आपके इस लिपा पोती के सामान लगाने के लिए उनके पास समय ही कहाँ जितना भी समय मिलता है उस समय में भी वह घर का चूल्हा चौका का काम कर लेती है बाकि जो बचे घास काटने निकला जाते हैं उन लोगों को तो खाने की फुर्सत तक नही होती और आप इस सामान को वहां बेचना चाहते हैं
मेनेजर- एसी बात नही है इसके कई फायदे भी हैं एक तो आपको रोजगार मिलता है दूसरा घर के सामान अच्छे कीमत पर मिलता है
पागल- अगर ऐसा ही है तो आप किसी दुकानदार या गोदाम वाले को पकड़िये ना।
(एक घंटे से ऊपर हो चूका था लेकिन अभी तक मेनेजर ने चाय पानी के लिए नही पूछा। पागल थोडा खीज सा गया था। मन ही मन यही सोच रहा था मेनेजर होकर भी चाय न भी सही कम से काम पानी तो पिला देता इतनी दूर से आया हूँ)
मेनेजर- जी नहीं यह प्रोडक्ट हम  अपने शेल्स् मेम्बरों द्वारा ही बेचते हैं
पागल-वो कैसे ?
मेनेजर- जी पहले हम नयां मेंबर बनाते हैं पंद्रह सौ रूपये दो और हमारा मैम्बर बनिए इसके बदले में आपको लत्ता कपडा और डिस्काउंट के साथ सामान मिलेगा।
(यह सुनकर पागल भनभना सा गया। वह समझ गया कि यह मार्केटिंग का चक्कर है।और यह दिमाग की दही कर रहा है )
पागल-सीधे सीधे कहिये आप मुझ से क्या चाहते हैं
मेनेजर- हम आपसे ये चाहते हैं कि आप भी 1500 रूपये जमा कर हमारे मेंबर बनिए। जो सामान मिलता है वह तो आपको मिलेगा ही । साथ ही हम आपको पहाड़ का शेल्स् प्रोडक्ट मेनेजर बना देंगे। आप दिल्ली में इतने जगह मीटिंग वगैरह में जाते रहते हैं एक या दो भी हर मीटिंग से लोगों को जोड़ेंगे तो आपको भी फायदा होगा
पागल- वो कैसे और मुझे क्या करना होगा।
मेनेजर-अगर आपको पहाड़ जाकर ऐसे ही चैन की तरह जोड़ते है तो उतना प्रॉफिट|  जितना जोड़ेंगे उतना ही आपको प्रॉफिट होगा
पागल-वो कैसे?
मेनेजर- आप जितना जोड़ेंगे उतने ही आपको चैक मिलेंगे और हर चैक का अमाउंट पञ्च हजार होता है। बाकि का काम आपके पीछे जो जुडेंगे वे अपने आगे जोड़ते जायेंगे। सामान की जितनी बिक्री होगी उसका अलग से चैक मिलेगा।
(जो पागल प्रकृति पर निर्भर रहने की सलाह दूसरों को देता हो वह कैमिकल से भरी चीजों का समर्थन कैसे कर सकता था | अब क्या था  जी  एक तो पहले से ही यह पागल| ऊपर से  इन प्रोडक्ट को सुनने के बाद बहुत चिढ़ गया । दूसरा यह कि वह अपना कई काम छोड़कर उसके पास  उम्मीद से आया था। जो सब चूर चूर हो गया जो समझा था ठीक उसके उलट हुवा। पागल अब सठियाने लगा था)
पागल-अबे अरे मेनेजर। मुझे यहाँ बुलाने से पहले एक बार मेरे बारे में ठीक से जान तो लेता। जान लिया होता तो अपनी बेज्जती करवाने के लिए न बुलाता। तुझे पता है कि में पागल हूँ। फिर भी तूने मुझे बुलाया कम्बखत कहीं के तेरे गुड़ गोबर कच्यार जैसे प्रोडक्ट को बेचने के लिए मैं ही मिला था क्या?
मेनेजर- पागल जी आप तो खामखा में गुस्सा हो रहे हैं।
पागल- किस्मत अच्छी थी तुम्हारी कि आज मैं अपना डांसी ढुंग नही लाया वरना ......। अगर मुझे तुम कभी अपने गांव की तरफ या आसपास भी दिखाई भी दिए तो .......या तो तुम रहोगे या फिर मैं।
(मेनेजर का सारा स्टाफ घेरा बांध कर सब देख रहे थे। सब चुप किसी की हिमत न हुई आगे आने की| मेनेजर का चेहरा लटक सा गया। यह पागल  खड़ी खड़ी सुनाकर वहां से लौट आया।

Monday, January 4, 2016

कस देख्यंछै

कस देख्यंछै
धें तू कस देख्यंछै
आँखों में झप-झपाइ रौंछे
म्यर ठेकुली मेरी ठेकी 
हरदौल वाणी 4 जनवरी 2016
धें तू कस देख्यंछै

स्वेणु में रंग बिरंगी देख्यंछै
नखकी नथणी भौल देख्यंछै
गौ, गलोबंद पैरी थाई रौंछे 
रंगाई पिछौड़ ओढ़ी छाजी रौंछे 
म्यर ठेकुली मेरी ठेकी 
धें तू कस देख्यंछै

सौ सृंगार तेरो चमकन देख्यंछे 
गोलमटोल मुखड़की फनार देख्यंछे 
फर-फरान घागरि झपकन देख्यंछे 
छम छमान हिटणो तेरो बान देख्यंछै
म्यर ठेकुली मेरी ठेकी 
धें तू कस देख्यंछै

बारो मास त्यर स्वेण देख्यनु
पछिल त्यर धुरकण देख्यनु 
दिन धोपरि त्यर अनार देख्यनु 
कब आली तू, त्यर इन्तजार करणु
म्यर ठेकुली मेरी ठेकी
धें तू कस देख्यंछै

Thursday, December 31, 2015

2015 जान जाने कैगो

घूम फिर बे आजि जनवरी ऐगो
नई सालक 2016 कलेंडर दिगो।
2015 जान जाने कैगो
भुलिया झन याद करने रया कैगो।

साल भरक गणना करिया
के भूल चूक हैगेछि याद करिया।
2016 में गलती झन दोहराया
यस 2015 कलेंडर कैगो।

आपणा कें याद धरिया
फोन-सौन-ठोंन करने रया
हंसिया-खेलिया, द्वड मौट है जाया
यस 2015 कलेंडर कैगो।

बुजुर्गों सेवा करला, आशीर्वाद फई जो
दिन दुगुण, रात चौगुण तरक्की करो।
ईजा बौज्यु सेवा करो
यस 2015 कलेंडर कैगो

जान जाने त म्यर नसीहत याद धरिया
सब आपणे छिं ककेँ दुःख झन दिया
ख़ुशी द्यला, खुश होला, बरकत ह्वेली।
यस 2015 कलेंडर कैगो। -प.भ.जो.पागल

Tuesday, December 29, 2015

मेरी ठेकुली



कुमाउनी गीत

म्यर बाना मधुली मेरी ठेकी
ठिकुली ठेकी,
काँ हरे गेछे मेरे ठेकी
ठिकुली ठेकी,

वार चायो, पार चायो
नि देखि तेरी गौर-फनार मुखडी,
तिगणि चान चने म्यर कमरे पड़गे टस्की
ठिकुली ठेकी,
कपन अलाषी रछे मेरी ठेकी
ठिकुली ठेकी,

धात लगौन लगौने मेरो
गौवा यो चिरोडी गो
पट्ट लेसी गे मेरी अवाजा
ठिकुली ठेकी,
को कुण लुकी रछे मेरी ठेकी
ठिकुली ठेकी,

वल कुड़ी पल कुड़ी
धुरकिणे में रेंछे तू
एक जगां नि टिकनि तेरी ठौरा
ठिकुली ठेकी,
धूरका-धुरूक कहाँ हैरे मेरी ठेकी
ठिकुली ठेकी,

गांव और पलायन का रोना धोना


गांव-गांव नही रहे अपितु खँडहर हो गये। जी हाँ आप बिलकुल सही समझ रहे हैं। भारत के अधिकांश गांवों की कहानी कुछ यही कहती हैं। पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लकर दक्षिण तक के गांव ख़ाली होते जा रहे हैं। गांवों में लोग रहने को तैयार नही हैं। सभी शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। भले ही शहर के एक कोने के एक कमरे में भेड़ बकरियों की तरह घुट कर जियें, लेकिन रहना शहर में ही है।

गांव की सुन्दर प्राकृतिक हवा, पानी को छोड़, शहर के प्रदूषण में रहना अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं लेकिन गांव में वे अपने को असहाय समझने लगे हैं। एक दूसरे की देखा देखि में बाकि गांव के लोग भी गांव छोड़कर शहर की ओर रुख कर रहे हैं गांव में बने आलिशान महलों को खँडहर बनाने के लिए छोड़ रहे हैं ।

पलायन की गर बात करें तो सबसे अधिक उन राज्यों पर पड़ा है जहाँ अभी तक सुख सूविधा के लिए लोग वंचित हैं, विशेषकर उत्तराखंड, हिमांचल पहाड़ी क्षेत्रों के अलावा बिहार, छतीसगढ़, झारखण्ड जैसे राज्य पलायन का रोना रो रहे हैं। पलायन का दर्द क्या है यह उन गांवों में जाकर उन खंडहारों से पूछना पड़ेगा कि ऐसी दुर्दशा किसने, कैसे और क्यों हुई? ख़ाली खंडहर घरों में बताने के लिए तो आपको लोग मिलेंगे नही, हाँ आपको वहां के घर, वहां के पेड़, पौंधे, हवा, पानी आपको एहसास जरूर करायेगी की इनके साथ पराया जैसा बरताव क्यों हो रहा है।

अगर मैं ये कहूँ कि यह सिर्फ पलायन की मार एक गांव या एक क्षेत्र का है तो यह गलत होगा क्योंकि यह अधिकांस भारत के अन्य गांवों के साथ अन्याय होगा, जो पलायन की चपेट में आकर रोना रो रहे हैं। यही बात अगर उत्तराखंड की करें तो पिछले एक या दो दशक से पहले गांव अपने अच्छे खासे हालत में थे। एकाएक उनके साथ ऐसा क्या हुआ कि गांव के गांव खाली होने शुरू हो गए? इस प्रश्न पर मंथन करना बहुत जरुरी है।

200-300 परिवारों का एक गांव में आज सिर्फ गिने चुने 30 या 40 परिवार ही रह गए हैं बाकि के शेष परिवारों के घरों में ताले लटके हुए हैं। जो व्यक्ति गांव में रहा है जिसने गाँव को जिया है वह  घरों की ऐसी जरजर हालत देख एकाएक आँखों से आँसुओं की धार को रोक नहीं पाएंगे। गांवों की हालत यह है कि जो परिवार जैसे तैसे अपना जीवन गांव में बिता रहे थे, आज वे भी अपने घरों के केवाड़ में ताला लगाने को मजबूर हैं। वे भी शहर का रुख कर रहे हैं। कई घरों की हालत इतनी बत्तर हो चुकी है कि कभी भी टूट कर गिर सकते हैं। हाल यह है कि उन घरों की देख रेख करने वाला कोई नही।

अब भी  गांव में बचे कुछ लोग अपनी किस्मत आजमा रहे हैं इसी आस पर कि कोई तो उनकी सुध लेने को आएगा।वे लोग अपनी निर्धनता के कारण गांव नही छोड़ सकते हैं, उनके पास इतना पैसा नही है कि वे लोग शहर जाकर रह सके । कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होने अपना पूरा जीवन बचपन से लेकर जवानी और अब इस बुढ़ापे तक का जीवन गांव में रहकर ही जिया है, अब अंत के दिनों में वे अपने गांवों में ही रहना पसन्द करते हैं। वे लोग नही चाहते कि इस उम्र में शहर जाकर घुटन की जिंदगी जिया जाय। उनका कहना यही है कि अब मरेंगे तो अपने गांव में, शहर की चकाचोंध तुम्हें ही मुबारक ।

कुछ लोगों का गांव में रहना मजबूरी सी हो गयी है। ये वे लोग हैं जो सरकारी कर्मचारी हैं जैसे-शिक्षक, वन विभा व अन्य सरकारी संस्थानों के कर्मचारी हैं। इनमें कई सरकारी कर्मचारी ऐसे है जो अपने गांव में रह तो रहे हैं लेकिन उनके बच्चे, उनका परिवार शहर में रह रहा हैं जिस दिन इन्हें छुट्टी मिलती है उस दिन ये अपने परिवार के साथ छुट्टी बिताने चले जाते हैं। या यूँ कहिये ये लोग सिर्फ अपनी नौकरी-पेसे के लिए गाँव में रह रहे हैं।

गांवों में रहे-सहे कुछ ठेकेदार कुछ नेता बिरादरी के लोग जो कि गांवों में अपना फन फैलाए बैठे है। जो लोग गांवों से पलायन कर गए हैं उनकी जमीनों पर इनकी टेडी नजर हैं उन जमीनों से पत्थर मिट्टी जो हाथ लगे बेच रहे हैं कोई रोकने टोकने वाला नही। जैसा चाहे वैसे मनमाने तरीके से फल फूल रहे हैं। बैठे बिठाये करोड़ों का माल अन्दर बहार हो रहा है।

आज वे ही लोग गांव में रह रहे हैं जिनकी या तो मजबूरियां रही होंगी या फिर वे लोग जिनका धंधा-पानी अच्छे से फल फुल रहा हो। बाकि बचे गांव के लोग पलायन कर गए हैं, कई और गाँव के लोग पलायन करने की तैयारी में हैं। गरीब परिवार गांव छोड़ने पर मजबूर हैं गांव का जीवन कष्टदाई तथा दूभर होने लगा है। आस-पड़ोस के खाली घरों को देखकर उनका जीवन खाली खाली सा लगने लगा है गांवों में एक कहावत अक्सर कही जाती है “खाली घर और खंडहर भूतों का घर होता है”। गांवों का यह हाल देख कर बाकि के लोग अब छोटे छोटे शहरों में, जहाँ चंद लोगों का जमघट हो, वहां रहना उनके लिए एक मात्र विकल्प बचा है |

        गांवों से पलायन की अगर बात करें तो वर्ष 1991 से 2001 के बीच 7 करोड़ 30 लाख ग्रामीण अपने मूल-निवास स्थान से कहीं और जाने के लिए विवश हुए हैं। इसमें से अधिकतर 5 करोड़ 30 लाख ग्रामीण किसी अन्य गांव में जाकर बसे हैं, जबकि एक तिहाई से भी कम याने कि 2 करोड़ के आसपास ग्रामीणों ने शहरों का रुख किया। यदि 1991 से 2001 के बीच का निवास-स्थान को आधार माने तो 30 करोड़ 90 हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा, जोकि देश की जनसंख्या का 30 फीसदी है। प्रथम जनगणना 1951 के समय में ग्रामीणों की आबादी 83 प्रतिशत एवं शहरी 17 प्रतिशत थी। 2011 की जनगणना में यह गांवों में घटकर 68 प्रतिशत और शहरों में बढ़कर 32 प्रतिशत हो गयी।पलायन का एक कारण यह भी रहा कि गांवों के कुटीर उद्योगों का पतन, भूमि हीन किसान, ऋणग्रस्तता, सामाजिक, आर्थिक और शिक्षा का पतन। शिक्षा व्यवस्ता पर एक नजर डालें तो  हाल यह है कि न स्कुल हैं न ही पढ़ाने को टीचर। भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है बहार की दुनियां क्या है, कैसी है इन सबसे वे लोग बेखबर हैं। कई गांवों का हाल कुछ अजीबोगरीब है। सरकारी योजनाओं के तहत सरकारी स्कुल खोले तो गए हैं लेकिन उन स्कूलों में  पढने के लिए बच्चे  हैं मगर टीचर नही हैं। कई स्कूलों में हालात ऐसे भी देखने को मिले हैं जहाँ एक टीचर है और पढ़ने के लिए 2 बच्चे। कई गांव में और भी बुरा हाल है  पढ़ने के लिए न ही बच्चे हैं न ही टीचर। सरकारी योजना के तहत जहाँ-तहां स्कुल खोल दिये हैं मगर   उन  गांव के लोग उस स्कुल को बाराती घर के रूप में प्रयोग करते हैं। कुलमिलाकर शिक्षा व्यवस्था एक दम चौपट है।

         वहीँ  दूसरी तरफ कुटीर उद्योगों पर नजर दौडाएं तो हालात और भी बुरे हैं। ग्रामीण लोग आजीविका के लिए दर दर भटक रहे हैं यदि गांवों में छोटे-छोटे कारखाने, उद्योग वगैरह आजीविका के लिए काम मिल जाता तो पलायन की इतनी बढ़ी समस्या उत्पन्न नही होती। राज्य व केंद्र सरकारों से मदद भी अगर मिली होती तो थोड़े बहुत कुटीर उद्योगों से ग्रामीणों का जनजीवन सुचारू रूप से चलता रहता पर ग्रामीणों के उद्योगों पर सरकारों ने कभी ध्यान दिया ही नहीं। वहीँ केंद्र सरकार स्मार्ट सिटी के नाम से  विकास के नाम पर दम ख़म भर ही है। अगर सही।माइने में सरकारें विकास करना चाहती हैं तो पहले गांवों से छोटे छोटे कुटिर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।तभी देश की आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी।साथ ही इस तरह के पलायन से सांस्कृतिक संघर्ष को तो जन्म देती ही है बल्कि नैतिक मूल्यों का भी अवमूल्यन होता है। गांवों में रोजगार के वैकल्पिक अवसरों का आभाव है। उच्च शिक्षा के प्राप्ति के लिए भी हमारे देश में पलायन का मुख्य कारण रहा है पलायन का एक मुख्य कारण भी रहा है, वह है सामाजिक विषमता तथा शोषण। बहरहाल वजह कोई भी हो लेकिन सीमा से अधिक पलायन हमारे सामाजिक तथा राष्ट्रिय तानेबाने के लिए हानिकारक हो सकता है।

गेवाड़ घाटी