Sunday, July 8, 2012

बच्चपन

कतु भल बच्चपन छि।

एक अलग दुनियां बसाई छि।
खूब खेल छि ,
खूब मस्ती करछी ।
न दुःख छि,
न गम छि ।
न खांण होश छि ,
न घर जाणक होश रुंछी।
कतु भल बच्चपन छि।।
कभते लड़ छि ,
थोड़ी देर में फिर ख़ुशी हैं जांछी।
न ककणी ढूंढ़ छि ,
न की लुकी लुकी बे डाड़ मार्छी ।
कभते यो कुड़ी ,
तो कभते पल कुड़ी ।
कतु भल बच्चपन छि।।
कोई न आपण छि,
न तो हम कैके छि।
हंस हंस बे लोगों कें ,
आपण बस में करछी ।
यो मतलबी दुनियां बटी,
बहुत दूर रुछी ।
कतु भल बच्चपन छि।।

Saturday, July 7, 2012

म्यर पहाड़ रूप देखि



म्यर पहाड़ रूप देखि,
 मन भरी उं छा।
वार डाना पार डाना,
 के भौलो मान्युछा।।

पार डाना हरिया घासा,
घस्यारों की रन बन ।
पहाड्की हवा-पाणी देखि,
 मन भरी उं छा।।

सौण भादो महेंण आयो
बरखा की रन बन ।
रौल मौल गध्यारा देखि
 मन भरी उं छा।।

खेती-पाति डाई-बोटी
बोट्यों की छ्याणी।
घुघूती की घुर सुणि
 मन भरी उं छा।

पाणी का नौ-धारा,
पन्यारों की रन बन ।
पहाड्की गागर-तौली देखि
 मन भरी उं छा।।

Thursday, July 5, 2012

बचपन की यादें


यादगार सिसोण (बिच्छु घास, गडवाल में- कनैल)

सीसोंण, कनैल (बिच्छू घास)
आज मुझे मेरे बचपन की याद आ रही है जब में लगभग १०-११ बर्ष का था । गेवाड़ घाटी की या यूँ कहिये कुमाऊं का सबसे बड़ा मेला सोमनाथ का मेला हर वर्ष मई के दुसरे सोमवार को लगता है जो लगभग १४ दिन तक रहता था । आज यह मेला सिमट कर मात्र ७ दिन का रहा गया है । मैं आप को वहीँ अपने बचपन में ले चलता हूँ । पहले समय में छोटे बच्चों को सोमवार और मंगल वार को जाने नही देते थे । बुधवार को मौका मिलता था । आज बुधवार है और आज हमें भी मौका मिला है सोमनाथ के मेले में जाने का । सुबह से मैं कभी इधर तो कभी इधर डोल रहा था । ख़ुशी इतनी थी मैं कुछ बता नही सकता । दिन का खाना भी भूल गया बस एक ही रट थी । आज सोमनाथ के मेले में जाना है । लगभग ३ बजे हमारे यहाँ से लोग मेले के लिए प्रस्थान करते थे, और अभी समय १२ बजे थे । और मैं १२ बजे ही मुंह हाथ धोकर अपने बक्शे में से नए कपडे निकल कर पहन लिया । जाना था ३ बजे और कपडे पहन लिया १२ ही । बार बार घडी को देखूं घडी चल ही नही रही है । घडी अपनी गति से चल रही थी पर मैं घडी को हर ५-१० सेकंड में घडी देख रहा था । धीरे-धीरे समय बीतता गया अब ३ बज ही गये । गांव के और लोग भी तैयार होकर निकलने लगे । में पहली बार मेला देखने को जा रहा हूँ । अपनी माँ के साथ अब घर से चलना शुरू किया । और मैं और मेरा बाल सखा हम दोनों आगे-आगे चलने लगे । अब क्या था जी कभी मेरा दोस्त आगे तो कभी मैं आगे बस दौड़ लगनी शुरू कर दी । मैं दौड़ लगा रहा था कि मेरे पांव में ठोकर लगी और मैं गेंद की तरह लोट-पोट होता हुआ सिसोण की झाड़ में घुस गया । अब क्या था जी किसे मेले की याद थी । अब तो सिसोण के वालावा कोई और शब्द निकला ही नही । मेरे साथ चल रहे मेरे दोस्त और मुझे आधे रास्ते घर को भेज दिया गया । मैं रोते हूँ घर पहुंचा । मैं कैसे भूल सकता हूँ वो यादगार लम्हें और ये सिसोण।

मेरा बचपन 





च्याऊं (कुकुरमुत्ता)
नमस्कार सुप्रभात । बचपन कितना 
सुखदाई होता है यही सोच कर हम 
लोग अपने आप को अपने की कुछ 
वस्तुओं को देखकर अपने बचपन को 
तलाश करते हैं मुझे याद है जब मैं 
छोटा था मैं और मेरा बाल सखा हम 
दोनों बहुत खेला करते जहाँ जाना है 
साथ जाते थे । एक बार बारिश के 
महीने की बात थी, बारिश ख़त्म होने 
के बाद हम दोनों घुमने निकल पड़े । 
बरशांत के महीने में कई वस्तुएं 
बहार निकल आती हैं जैसे कि 
(कुमाउनी में) घन्गुड, च्यांउं, 
(कुकुरमुत्ता) आदि, अधिक मात्र में 
निकल आते हैं । इसी बिच हमें एक 
छत्री पर नजर पड़ी हम दोनों उस पर 
टूट पड़े । इस के बाद क्या था जी 
अब तो निकल पड़े झाड़ियों में पांव 
पर जूते-चप्पल कुछ भी नहीं, ये भी 
नही सोचा कांटे चुभ जायंगे , बस 
दौड़ पड़े । जैसे ही दूर से दिखा भी तो पहले ही कह देते (यो म्यर छू मैल पैली देखो, ना मैल पैली देखो यो म्यर छू ) ये मेरा है । बात बात में 
झगडा कर बैठते थे । वास्तव में बिता हुआ बचपन कितना सुखदाई होता है । पचपन के लम्हों को याद कर 
हम लोग हंस बैठते हैं कभी कभी तो खुद बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं बार बार यही सोचते है कास यह 
बचपन फिर लौट कर आता 


गाँव की कुछ खट्टी मीठी बातें 


साथियों आज गाँव की कुछ बात आप सभी को अवगत करता हूँ गाँव में लोग किस तरह जीवन यापन करते हैं व उनकी भाषा शैली पर थोडा बहुत प्रकाश डालते हैं प्रकाश डालने से पहले मैं आप लोगों को बता दूँ 
मैं इस में कुछ कुमाउनी भाषा का भी प्रयोग करूँगा जो आप सभी को पसंद आयेगा । 


पुरुषों का समूह : गाँव में अधिकतर लोग शराब में डूब जाते हैं और इस के अलावा उन्हें कुछ सूझता नही है 
और कोई बात करने को होता ही नही है तो आइये और देखें किस तरह की बात करते हैं 




पधान जी : और हो हेम दा के हरी ठाट बाट,


हेम दा : के ना हो पधान सैप मौसम भौल है रो आज द्यो ले हैगो ।

पधान जी : ठीक कुनेछा हो हेम दा आज मौसम लागुणी जस है रो,

हेम दा : हो होय ठीक कुनेछा, हिटो पे, पा पार दानसिंह दुकान में हिटो,

पधान जी : किले हो राती राती पर खुल गे छो दुकान ।

हेम दा : होय पे आज तो मौसम आई हौय ।

पधान जी : हिटो पे हिटो ।

(दोनों लोग निकल पड़ते हैं दुकान की ओर वहां पर दो लोग विपिन दा और केशब दा मिल जाते हैं )

पधान जी : हाय येती विपिन और केशब दा ले बैठ रेई ।

केशब दा : आओ आओ हो पधान सैप ।

विपिन दा : ओ पधान जी आज तो थोडा बहुत हुनेचें ।

पधान जी : हो होय हिटो, लगाओ हो दानसिंह जी चार गिलास लगाओ ।

(दान सिंह जी शराब लेकर देते हैं और अब पिने के बाद देखिये किस प्रकार की बात करते है 


लड़खड़ाते हुए)

विपिन दा: ओ पधान जी पे ब्लोक बे कतु पैंस मिली ।

पधान जी : किले रे वोती खांण लाग रो छो के ।

केशब दा : किले पैस मिलनेर भाय तुम लोगुन कें हो पधान सैप।

पधान जी : तुम लोगुन कें म्यर पैंस जादा देखिनी नै (गालियों की बौछार करते हुए )

हेम दा : अरे पधान जी यों लोग पेई बाद यसे कुनि सब भूल जनि यूँ , हिटो अब तुम कें ले जादा चढ़ गे हिटो 


घर हैं जुल अब ।

(दोनों लोग घर को निकल बैठे । ये था आज के पुरुषों का समूह )

मित्रो यह लेख से यदि किसी को भी दुःख पहुंचा हो तो क्षमा चाहूँगा । यह लेख मनोरंजन मात्र है ।

Wednesday, June 27, 2012

पित्रों की धरोहर

पहाड़ की दशा देखि,
जिया भरी औंछौं।
पूरवोंजुंलें समेटी पहाड़,
पोथ्युंले छोड़ी पहाड़।
खिति पाती छोड़ी ,
घर बार छोड़ी ।
पुर्वोंजुंकें बसाई कुड़ी ,
पोथ्युंले छोड़ी कुड़ी ।
चार हाथक कुड़ी मजी,
रुंछिया दर्जन भरी ।
गोरु-बाछा भैंस-बाकर,
सब मिल झूली रुंछी।
कस यो जमान आयो,
पितरों की टूटी कुड़ी ।
पोथ्युं कें नि देखि कुड़ी,
बुजुर्गों कुड़ी हाल देखि।
बरसों समायी संपत्ति हमरी,
संकटों में छू यो धरोहर ।
दगडियो प्रदेश छोडो ,
अब देश लौट आओ ।
पितरों की धरोहर ,
फिर हरी-भरी बसाओ।
यही बारम्बार विनती छू,
पितरों कें कुड़ी-बाड़ी बसाओ ।
म्यर पहाड़ की दशा देखि ,
जिया भरी औंछौं।
जिया भरी औंछौं।।

Tuesday, June 26, 2012

नैना निहारते उसे


मन में इक उमंग सा,
खिल उठा तरंग सा,
पग पग डोलूं मैं,
उस की राह देखूं मैं ।
न जाने किस राह पर,
किसी अनजाने मोड़ पर,
किस अम्बर के निचे,
मिले खुशियों के लहर ।
किस डगर ढूढुं उसे
मन के नैन निहारते उसे
धुधली सी तस्वीर लिए ।
मन में इक  विस्वास लिए,
फिरता है चारों ओर उसे,
पूर्व तो कभी पश्चिम की ओर,
निकल पढता मंजिल की ओर ।

Sunday, June 24, 2012

इजू तेरी याद


इजू तेरी यादे एईगे,नि लागन त्यर बिन मन ।
घर-घर के याद एईगे,नि लागन त्यर बिन मन।।
इजू तेरी यादे एईगे,................

कसी रुनु देश प्रदेशा,
इजू तेरो दुलार बिन।
तेरो लाड-प्यार इजू,
कसी काटनु त्यर बिन दिन।
गौं-बाखेई कै यादें उंछो,
नि लागन त्यर बिन मन।।
इजू तेरी यादे एईगे.................

म्यर पहाड़ ठंडो-मिठो,
डाई-बोटियों की हवे बहार  ।
दगडियों कें दगड मेरो।
छुटी गिन प्रदेश मा।।
दगडियों कें यादें उंछो,
नि लागन त्यर बिन मन।।
इजू तेरी यादे एईगे.................

तेरी याद लिबेरि इजू ,
शिसक रुनु प्रदेश मा।
तेरी आशीर्वाद मेरो
छतर छायानी मा
मिगें तेरी यादें उंछो,
नि लागन त्यर बिन मन।।
इजू तेरी यादे एईगे.................
{पं . भास्कर जोशी }

Saturday, June 23, 2012

किस से कहूँ क्या कहूँ ?


किस से कहूँ क्या कहूँ ?
खुद को न समझा पाया,
हर एक मोड़ पर,
चौकस सा रहता हूँ ,
न जाने किस मोड़ पर,
अपना साथ छोड़ दे ,
कौन अपना कौन पराया ,
किस गली को अपना कहूँ ।
इस दोगले इन्सानियत से,
कैसे भरोषा करूँ मैं ?
सोचता हूँ क्यूँ भार बनूँ ,
एक रोशनी सी उमड़ पड़ती है ।
जिस के सेवा के लिए जन्म लिया,
उनके सपनों से खिलवाड़ कर ,
क्या में खुश रहा पाउँगा ?
जिनके आशाएं टिकी हुई हैं ।
क्या क्या सपने देखे होंगे ?
इन स्वप्न को तोड़ कर ,
क्या इन्सानियत निभा पाउँगा मैं ?
किस से कहूँ क्या कहूँ ?
खुद को न समझा पाया,

गेवाड़ घाटी