Tuesday, May 5, 2020

पलायान की घर वापसी

प्रवासियों के लिए आसान नहीं होगा, गांव में जिंदगी जीना।
कई दशकों से उत्तराखंड का पलायन का दंश झेल रहा था। लेकिन दो दशकों से लगातार पलायान की रफ़्तार में दुगनी बढ़ोत्तरी देखने को मिली। घर, बड़ी बड़ी बाखली खाली होने लगे थे। आलीशान घरों में ताले लटकाने की दौड़ में उत्तराखंड के जिलों में प्रतिष्पर्दा देखने को मिल रही थी। कई गांव तो ऐसे भी जिनमे एक भी घर  आबाद नहीं था। पूरा का पूरा गांव खाली हो गए। लाखों की तादाद में उत्तराखंड के लोग शहरों का रुख करने लगे। रोजगार सबसे पहली प्राथमिकता रही। शिक्षा, स्वास्थ्य ने तो कमर तोड़कर रख दी। यह तक की उत्तराखंड सरकार ने पलायान आयोग का गठन भी किया। हालांकि यह सिर्फ कागजों और फाइलों के साथ साथ सरकार के चाय पीने व अल्मारी ठूसने तक सिमट कर रह गया। कहें तो "ढांक के तीन पात"।

सरकार ने कई स्कीमें भी चलाई, स्वरोजगार लेकर सरकारों ने बारी बारी से प्रवासियों को बुलाने क्व लिए कई योजनाओं की घोषणाएं भी की। उनमें से एक घोषणा भांग की खेती भी थी। इसी भांग की खेती' ने तूल पकड़ लिए। और सरकार को जनता से मुहं की खानी पड़ी। लेकिन प्रवासीय तब भी घर वापसी को तैयार नहीं हुवे। क्योंकि वे जानते थे। सरकार के भरोसे रहे तो भूखे पेट सोना पड़ेगा। दाने दाने को मौताज होना पड़ेगा। यही कारण रहा कि वे शहरों में भेड़ बकरियों की तरह घुट कर रहने लगे। कम से कम रोटी का जुगाड़ तो कैसे न तैसे हो ही जायेगा। बच्चों को शिक्षा और स्वास्थ्य की भरपूर साधन से भरपूर शहर में कुछ न कुछ तो जुगाड़ हो ही जायेगा। मगर गांव में क्या है? लेकिन इतने वर्षों के बाद भी न यह सरकारों को दिखाई दिया न ही पलायान आयोग को।

खैर मज़बूरी में  ही सही पर आज कई लाख उत्तराखंडी अपने गांव का रुख इस कोरोना काल में कर रहे हैं। जिसकारण से गांव छोड़ा था वही कारण आज शहर भी बन गए। रोजगारी बंद, शिक्षा बंद, स्वास्थ्य ठप। ऊपर से महामारी का खतरा अलग से। ऐसे स्थिति में गांव याद आना लाजमी है। रआखिर शहर में रहे तो रहे कैसे? नौकरी के लिये गांव से शहर आये। वही नौकरी से हाथ धो बैठे। बिगड़ते हालात को देखते यह भी समझ में आ गया कि आगे नौकरियाँ मिलने का चांस बहुत कम है। आखिर करे भी तो करें क्या? संभवत: ऐसे में गांव की ओर रूख करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता। इसे प्रकृति का बैक गेर कहें तो उचित होगा। लेकिन गांव लौट रहे प्रवासियों के लिए गांव में पुनः शुरू करना एवरेस्ट फतह करने जैसा होगा। 
भास्कर जोशी

Sunday, May 3, 2020

रात ठीक आठ बजे

ठीक आठ बजे प्रधानमंत्री जी टीवी पर दिखाई पड़ते हैं झस्स जैसी हुई लगा आज फिर कोई झटका मिलने वाला है । उससे पहले जी न्यूज़ पर बार बार ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी "प्रधानमंत्री जी कुछ बड़ा करने वाले हैं" रात नौ बजे देखें डीएनए। वहीँ NDTv पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी। "प्रधानमंत्री जी फिर कोई नई मुशीबत ढहाने वाले हैं" आज तक बार बार चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे । ब्रेकिंग न्यूज़ प्रधानमंत्री जी कुछ बड़ा करने वाले हैं सूत्रों से खबर कि पाकिस्तान से कभी भी  युद्ध कर सकते । इण्डिया टीवी ब्रेकिंग न्यूज़ प्रधानमंत्री जनता को कोई नयी सौगात देंने वाले हैं 
तभी ठीक आठ बजते हैं और प्रधनमंत्री जी टीवी पर दिखाई देते हैं "भाइयों और बहनों आज रात्रि से एक नया नियम लागू होने जा रहा है। देश भ्रष्टाचार में लिप्त है चुनावों में अरबों रुपये की हेरा फेरी है सत्तर सालों से यही होता आ रहा है। फलाने राज्य में हज्जारों करोड़ों रूपये पकडे गए फलां राज्य में नोटों से भरे गाड़ियां पकड़ी गयी। इसलिए हमारी कैबिनेट ने बड़ी सूझ बूझ के साथ यह निर्णय लिया है कि अब से देश के सारे चुनाव फेसबुक सोशल मीडिया पर ही होंगे। राष्ट्रपति चुनाव से लेकर ग्राम प्रधान के चुनाव तक।
हमारी केबिनेट के दिग्गज पंडितों ने यह निर्णय लिया है कि चुनाव को अलग अलक पेज और ग्रुपों के माध्यम से किया जायेगा।
1- ग्राम प्रधान, बीडीसी मैंबर, और जिला पंचायती चुनाव- यह सभी चुनाव अलग अलग ग्रुपों के माध्यम से किये जायेंगे। जिसके फोटुक पर सबसे ज्यादा लाइक कमेंट्स होंगे वह विजयी घोषित कर दिया जायेगा। ऐसे ही जीते हुए कैंडिडेट से ब्लॉक प्रमुख और जिला अध्यक्ष चुने जायेंगे।
2- विधान सभा और लोक सभा के चुनाव- विधान सभा और लोक सभा के चुनाव फेसबुक पेज के माध्यम से किये जायेंगे। जितने कैंडिडेट होंगे उनके फोटुक फेसबुक पर पार्टी नाम सहित अपलोड किए जाएंगे। जिस फोटुक पर सबसे अधिक लाइक कमेंट्स और शेअर किया जायेगा उसे विजयी घोषित किया जायेगा। विजयी कैंडिडेटों का राज्यी और केंद्रीय ग्रुप तैयार किया जायेगा जो मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री कैंडिडेट को चुनेंगे।
3- राज्य सभा और राष्ट्रपति जी के चुनाव को भी इसी तरह उपयोग किया जायेगा। जिस से देश में हो रहे भ्रष्टाचार से हमें मुक्ति मिल सकेगी। मुझे आशा है पुरे देश वासी यह जानकर प्रसन्न होंगे कि आज से यह नियम पुरे देश में रात के बारह बजे घंटा बजते ही लागू कर दिया जायेगा। नमस्कार जय हिंद जय भारत।
जोर की झास्स्स हुई मैंने कहा रे आज फिर क्याप्प जस हो गया। टीवी का स्विच खोला सारे न्यूज़ खंगाल डाले तब मालूम हुवा मैंने कल रात बड़ा भयानक सपना देखा।

कविता : दाज्यू हमर हाई फ़ाई

दाज्यू हाईफाई

दाज्यू हमर हाई फ़ाई, कुर्सी लिजी हाई खाई
उत्तराखंड खोड़ी खशोड़ी, दाज्यू फरफराई

तुम लै कुंछा गैरसैण,
उं लै कुनि गैरसैण
गैर हैगो गैरसैण,
बैर किलै गैरसैण
राजधानी क, स्वेण हराई
दाज्यू पुजा देहरदुन, खाणि मलाई

दाज्यू हमर हाकिई फ़ाई, कुर्सी लिजी हाई खाई
उत्तराखंड खोड़ी खशोड़ी, दाज्यू फरफराई

आम खंछा जेठ में ,
नीमू खंछा पूस में
ककड़ खंछा भदो में
कंफो खंछा चैत में
खाण पिणो क, जोर है रायीं
दाज्यू पुज गईं दिल्ली, खैगयीं भद्याई

दाज्यू हमर हाई फ़ाई, कुर्सी लिजी हाई खाई
उत्तराखंड खोड़ी खशोड़ी, दाज्यू फरफराई

पांच साल भोट में
भोट गयीं नोट में
नोट गयीं बोतल में
बोतल पड़ी रोड में
पांच साल क, शराब बेचि गईं
दाज्यू पुज गयीं पहाड, पहाड़ बेचनाई

दाज्यू हमर हाई फ़ाई, कुर्सी लिजी हाई खाई
उत्तराखंड खोड़ी खशोड़ी, दाज्यू फरफराई
भास्कर जोशी

कविता - गांव की ओर

लौट चल गांव की ओर

लौट चल गांव मुसाफिर
लौट चल फिर गांव को।
छोड़ गया था तू जहाँ
फिर वहीँ से कर शुरू।

लगा दिए थे घरों में ताले
खोल फिरसे उन दरवाजों को
वर्षों से देवथान में पड़े थे जले
जला दीये, रोशन कर फिरसे घर को।

बंजर हो गयी थी पुरखों की खेती
बैलै दौड़ा फिर "हल" कर खेतो को
लिए चल कंधों पर बीज की पोठली
कर दे फिरसे हरे भरे इन खेतों को।

नौले, स्रोत, गाड़ गधेरे तेरी राह देख रहे
गली चौराहे की पगडण्डी बाट निहार रहे
प्रकृति अपने बांह फैलाये खड़ी है कबसे
कर फिरसे खिलखिलाते आबाद गांव को ।

शहर से लौटने का कर दृढ संकल्प
गांव की मिट्टी संग फिर से नाता जोड
बहुत घुट लिया चार दीवारों की बीच
अब तो खोल गांव के उन दरवाजों को।
भास्कर जोशी

प्रेस वार्ता : 14 कोरोना पर भिकुदा से हॉटलाइन पर बात चीत


रिपोटर:- भिक़ुदा नमस्कार हो
बल भिकुदा कहाँ हो आजकल। और कोरोना काल में कौन कौन सी डिस बना कर खा रहे हो अकेले अकेले ?
भिकुदा:-
दै बज्जर कां जों कुंछा, 'न घरक कै राय न बणकै राय'। य कोरोना तो आफत बड़ी बेर ऐ पड़ौ। काम धाम ठप। जबतक राशन भतेर छ तबतक ठीक छ। बादक वी करौल विचार।  य लै भल भै कि आजकल सब कुक और हलवाई बड़ गयी। यूट्यूब पै रेसपी देख बेर सब नई नई डिस बणोंण लै रई। अज्याल साधन और डबल सबनै पास भै। कैक पास सकर सकर तो कैक पास कम कम। पैली तो न लोगों पास साधन छि न डबल। जै लै उपज करि वी कच पकै खाय। अज्याल तो घर घर में यूट्यूबी हलवाई है गयीं। कोई गोल गप्प बनुनो, को जलेबी, को केक, को रसगुल्ला, जै मन जौस उ उसै डिस बनै खाणो। चलो भल भाई नानतिना लै मुख लै रौल।
रिपोटर:-
भिकुदा लॉकडाउन में और कर भी क्या सकते हैं। घर में बैठे बैठे भी आदमी करे भी तो क्या करे?
भिकुदा:-
दै भुलू लॉक और डाउन द्विए भै। तस में के हूँ कुंछा। द्वि चारेक नाई ग्यु हुंची उं लै हाथ बटि निकई गयी। आदुक साल बटि मेहनत करि कुरी सब बर्बाद है ग्यान। फडू लिबेर खेत खनि भै, खै निखै बेर नाई-एक ग्यु बुति, पुषक मेहन रात्ति चार बजी जागि बेर तुस्यार नि देख तब पाणि डाल। और आज जब फसल काटणक टेम आई, तब य कोरोना काव लै पड़ौ। भुलू सब ग्यू गाड़ लै गो। रई सइ कसर बे टैमक द्यो और डाव पुरि करणो। अघिल कें कसि दिन देखण पणु य तो वी माथ वाव जाणो।
रिपोटर:-
बल भिकुदा ऐसे में कोई कर भी क्या सकता है मैंस बचा रहेगा तो सबकुछ फिर हो जायेगा ?
भिकुदा:-
'इथक जों भ्यो, उथकेँ जौं तो रौ'। आखिर करूँ तो करूँ के। मैसुं डबल समाई रै जैंल। राशन पाणि जै नि हौला तो के कराल तौ मैंस। ऐल कोरोना, भो भुखमरी जस लक्षण दिखनायी। भुलू त सोची बेर टोप मारि रोंनु। भल बखत पर फोन करो, आपण उदगार भ्यार खेति हैली। आपु और आस पड़ोसियों ध्यान धरिया, बची राया।
भास्कर जोशी

Thursday, August 31, 2017

म्यर पहाड़ बानर

म्यर पहाड़ क बानर
य कुड़ी पल कुड़ी
धुरका धुरुक न्यार
न डर, बिल्गहूं न्यार उणी

सार खेत पाती बांज है गयीं
बुतुण हालो चै चितै टिप जाणी
लगुल बुतो टुक चट कर जाणी
कि हूं कुंछा दाज्यू पहाड़ में
झिट घड़ी सफा चट कर जाणी

अनाज भ्यार सुकौहूं हालो
बौज्यू जै माल सपोड जाणी
घर भतेर राशन समाय बेरि धरो
च्वांक ऐ बेर ध्वांर में बैठ सपोड जाणी

रई सई उँ ठुल बानर नि खाण दिणाय
जो ऊनि दल बांग लिबेर घर घर जानी
मि तुमर मि तुमर कै, भीख मांग जानी
पाई पाई बचि खुची, मौ लगै जानी।

सवेंण दिखुण में उनन पी एच डी कराखि
झुट बलाण महारत हासिल कर राखि
म्यर पहाड़ मैस हराइ जस टोप मार राखि
उनर मनखी को जाणो, बात दुःखकि
……………………………………
………………………………………
…………………………………

गणेश ज्यु बर्थडे

ओ गणेश ज्यु।
कां छा हो
आज तो खूब झरफर हेरै हुनेली
कां जूं कैवाँ जूं हैरै हुनेली
तुमर वां ब्याव को आज
पार्टी सार्टी भी होगी क्या
केक सेक लै बड्याँट से हीकटेगा बल
 ब्योल्च से सोरा सोर होगी बल
 आज ढोल  दमु बैंड लिबेर खूब स्वागत हुणो तुमर
नाचने कूदने खूब लोग मिठै बाँटनयी
मंदिरों में भ्यार बटि लंगर लै चाल् है गयीं
एल तुम लै खूब  फ़ौरी रैई हुन्याला
विसर्जनक दिन जब यूँ लोग
पी खै बेर शक़राबक धुत्त में
गध्यार मैं बगै द्याल
तब तुमन कैं अन्ताज आल
यों तुमर लिजी ना
आपन पीण खांणक जुगाड़ करणी।

प्रवासीय की पीड़ा

य कविता जो शहर में रूनी, कभे घर पहाड़ जाणक मौके नि लगान पर रटन पहाडक जरूर भै। उनर पीड़ा कै कविता में उतारण कोशिश छ भल लागली तो जरूर बताया।

प्रवासीय की पीड़ा

दाज्यू को जाणो पहाड़
कि ल्याला पहाड़ बटि
म्यर गौक लै हाल चाल दिखी आया
म्यर गौंक लै खबर बात पुछ ल्याया।

मि अब शहरी है गयुं
मि अब परिवार वाव है गयुं
रत्ते रत्ते ड्यूटी बाट लाग जानू
ब्याव कभे घर पूजों, के टैम नि भय
नि मिलन मौक अब पहाड़ जाणक
इपने शहरों में लटपटी अलझि रौनु ।

कधीने गौं गाड़क याद एन्छो
नानतिनान  कै आपण बचपन बतौनु
गोर भैंस चरूणक किस्स बतौनु
खेल खेल में मैंसूं पुल्लम खुमानी चोरी किस्स बतौनु
कसिक दिन हमूल पहाड़ में काटि
आज उन दिनन कैं तसैके याद कर ल्युनु।

भट्ट, गहौतक डुबक, मांसक चैन्स
कल्यो में, मडुवे रौट और लाशणक लूंण
चहा-मिश्री कटुक दगै हडकै लिंछि
आ-भागी तू लै आ कैबरे नीबू सानछि
रंगत छि उं दिना जब हम पहाड़ में छि
अब शहर में तसकै रग-बगी गोई।

लला तुम पहाड़ आपण घर जाला
म्यर गौं, म्यर घ्वेटक लै हाल जाणी लिया
अहांण-कहांण तो बजि-गो कुनैच्छि
वॉर पौरक लै घर बांज हैगो कुनैच्छि
तुम घर जाणे हुन्याला
म्यर गौं लै खबर बात पूछ ल्याया।
भास्कर जोशी।

कै पहाड़ ?

कै पहाड़ ?

को पहाड़ कैक पहाड़
न म्यर पहाड़ न त्यर पहाड़
जैक पहाड़ विल लुट पहाड़
खाय पहाड़ भर पहाड़
न रौय पहाड़ न बचि पहाड़
लूट पहाड़ खशोडी पहाड़
चुनि पहाड़ झकोरि पहाड़
न बौज्यूक पहाड़ न बुबूक पहाड़
नेताओं पहाड़ माफियाओं पहाड़
बेचि पहाड़ धंध पहाड़
झन कया म्यर पहाड़
भुलि जया म्यर पहाड़
जान बचि रौली पै पहाड़
लठ्ठ खांण पड़ा कै पहाड़
देखहूँ आला कभते पहाड़
होटल बटि देखि जया पहाड़
को पहाड़ कैक पहाड़
न त्यर पहाड़ न म्यर पहाड़। -भास्कर जोशी

केंद्र सरकार की नाकामी

ये मोदी सरकार की नाकामी नहीं तो और क्या है। 144 धारा लगाने के बाद हजारों की हुजूम लेकर रामरहीम के समर्थक देश की बर्बादी कर रहे हैं। यह सब किसकी जेबों से भरपाई की जाएगी ?

मुझे याद है जब हरियाणा में चुनाव होने थे तब हरियाणा में बीजेपी का एक बड़ा सा तबका रामरहीम से मिलने गया था और उस से समर्थन को कहा था तब डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम ने बीजेपी को समर्थन देकर बीजेपी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी।

यही कारण है कि खट्टर सरकार उनके समर्थकों को रोकने के बजाय उनके समर्थकों को खुल्ला छूट दिया हुआ है। धारा 144 लगाने के बाद किसकी मजाल कि कोई सरकारी वाहनों या अन्य वस्तुओं को आग के हवाले कर दे। सरकार के अपने वोट बैंक और नाकामी  के चलते 25 से अधिक लोगों की जान चली गयी।

 जब 25 लोगों की जान चली जाती है कई लोग घायल हो जाते तब खट्टर साहब का बयान आता है। अरे कुछ तो शर्म करो। लोगों की जान जाने के बाद भी तुम जैसे गैरजिम्मेदाराना लोग सरकार में बने कैसे रह सकते हो। ऐसा ही कुछ उत्तरप्रदेश में भी हुआ जब 30 बच्चों की जान चली जाती है तब दवाब में ये बयान देते हो कि हम इसकी तहक़ीकात करेंगे। आप जैसे गैरजिम्मेदार लोगों के मुंह से बस यही सुनना बाकी रह जाता है।

मोदी जी धन्य हैं आप और आपकी विकास वाली टीम का। जो देश में बहुत अच्छे से विकास ला रहे हो। यही विकास था ना आपका । कि मजे ले कोई और भरे कोई। शर्म करो धिक्कार है ऐसी राजनीतिक व्यवस्था । धिकार है तुम्हारी कानून व्यवस्था पर।

घंतर-14 प्रेस वार्ता विथ भीकूदा



बल भीकूदा देश में यह हो क्या रहा है?

आप तो मीडिया हैं क्या आपको पता नहीं कि देश में क्या हो रहा है। हां पता होगा भी कैसे चीन मीडिया की तरह आप लोग भी सरकार की बोली बोलते हैं तब ऐसे में  आपको  देश की परेशानी कहाँ दिखाई पड़ती हैं। मीडिया तो आजकल सरकारों की कठपुतलियां बनकर रह गयी है।

नहीं भीकूदा ऐसा नहीं है अब राम रहीम को ही देख लीजिए , मीडिया पूरा कवर कर रही है।

जी हां दुनियां देख रही है मीडिया किसे कवर करती है किसे नहीं। यदि मीडिया चाहती कि वह स्वतंत्र होकर देश की तमाम मुद्दों को सामने लाकर सरकार के सामने रखती और सरकार के मंत्रियों से पूछती कि आप जनता के समस्याओं का निदान क्यों नही करते ? क्यों जंतर मंतर पर खड़े होकर लोग मागें माँग रहे हैं। उनकी मांगे पूरी क्यों नहीं करते ? पर मीडिया का ध्यान उधर कहाँ हैं वहां से TRP भी तो नहीं मिलती। रही बात राम रहीम की । उसे तो आप कवर करोगे ही क्योंकि उससे आपको TRP तो मिलनी है साथ ही सरकार में बैठे मंत्रियों तक आपकी रिपोर्ट पहुंच सके और वे अपनी बयान बाजी कर सकें। उसके बाद आप उन बयान बाजी पर बेतुकी डिबेट कर हम लोगों का मत्था चटोगे। क्या यही काम रह गया मीडिया का ?

भीकूदा मीडिया तो हमेशा ही देश दुनिया के मुद्दों को उठती रही है। चाहे वे घोटाले हो दंगे हो, भ्रष्टाचार हो , सामाजिक मुद्दे हो सभी तो उठती रही है, मीडिया ही तो है जो दुनियां के सामने कच्चाचिट्ठा खोल कर रखती है ।

जी इस बात से इनकार नहीं करता कि मीडिया ऐसे मुद्दों को सामने नहीं लाइ। जरूर लाई। परन्तु मौजूदा हालात पर गौर करें तो अभी मीडिया सरकार के अधीन है सरकार जैसा चाह रही है वैसा ही शो कर रही है। अब  उत्तराखंड के पंचेश्वर बांध को ही ले लें । इस मुद्दे को मीडिया ने कौन सा स्थान दिया। वहां के लोगों को न ही विस्थापन के लिए कोई भूमि आवंटित की न ही किसी प्रकार का मुआबजा देने को सरकार सरकार राजी है। सबसे बड़ी बात की सरकार पर्यावरण को लेकर सरकार बड़ी बड़ी बातें करती है ऐसे में उत्तराखंड नदी नालों में बांध बनाने से सरकार क्या बतलाना चाहती है। क्या मीडिया ने समस्याएं सरकार के सामने रखी ? क्या उन हुक्मरानों से पूछा कि आप पहाड़ की जनता के साथ ऐसा दूर व्यवहार क्यो कर रहे हो ? नहीं पूछा ना । भला क्यों पूछोगे। उसी सरकार की बदौलत ही तो तुम्हारा न्यूज चैनल् और प्रिंटिंग प्रेस चल रहे हैं। ऐसे में मीडिया कहाँ हैं ?

भीकूदा के घंतर चालू आहे ।

Wednesday, July 5, 2017

कविता : जगरियक आशीर्वाद



भम-पा पक़म, भम-पा पक़म
टन टना टन, टन टना टन
शहरी स्वकारो तसिके पहाड़ ऊने राया
तुम तसिके भूत छौ पूजने राया
भम-पा पक़म,भम-पा पक़म
टन टना टन, टन टना टन

बाट घवेंटु ख़ूब छौ छितर लगै लिजाया
साल भरक छौ छितर महेण में पूजने राया
मशाण भूत प्रेत लगौने राया
तुम तसिके पहाड़ में पूजने रै जाया
भम पा पक़म, भम-पा पक़म
टन टना टन, टन टना टन

पहाड़ एबेर अड़ोसी पड़ोसी कुँ गाई ढाई दिजाया
भकार भरि बेर हंक लगै लिजाया
हंक धुण में ख़ूब बकार काटि जाया
तुम तसिके पहाड़ में पूजने रै जाया
भम-पा पक़म, भम-पा पक़म
टन टना टन, टन टना टन

तुमर छौ छितर में मुर्ग़ी फ़ारम फ़ई जो
तुमर हंक धुण में बकारक मालिक मालामाल है जो
शराबी कबाबी पी खै बेर बारोमास घूरी पड़िए रैजो
तुम तसिके पहाड़ में बार बार पूजने रैजाया
भम-पा पक़म, भम-पा पक़म
टन टना टन, टन टना टन

मगें रोज तसिकै बलौने रैया
तसिकै हुडुकी थाई बजुनें रूँ
खै पी बेर म्यर रोज़गार दुब जस फई जो
तुम तसिकै पहाड़ पूजने, भेटने राया।
राज़ी राया ख़ुशी राया स्वकारा।
भम-पा पक़म, भम-पा पक़म
टन टना टन, टन टना टन
भास्कर जोशी

Monday, July 3, 2017

कविता

लिखना कुछ और चाहता था मगर लिखा कुछ और ही गया-

लोगों का क्या
उनका काम है कहना
इधर की उधर करना
और उधर की इधर करना।
कहीं मलाई लगाना
कहीं कानों में फुस्काना
चमचागिरी करना
लोगों का क्या
उनका काम है कहना ।
सीधे सादे लोग
अब तुम्हारी यहाँ कोई जगह नहीं
तुम पैदा ही गलत वक्त पर हुए हो
मांग भले ही आज भी तुम्हारी कहीं हो रही हो
मगर गेहूं में घुन की तरह
 तुम जरूर पिस जाओगे
लोगों का क्या
उनका काम है कहना।
एकदम पाक साफ हैं वे लोग
जिनके हाथ रंगे हो रंग से
वे न जाने कितने मुखौटे लिए हुए हैं
फिर भी बेदाग़  सर उठाकर शान से जी रहे हैं
लोगों का क्या
उनका काम है कहना।
सीधे लोग अपना अस्तित्व कैसे बचाएं
कैसे जिए वे इस धूर्त परिपेक्ष में
धीरे धीरे लुप्त हो रही यह प्रजाति भी अब
अगर कहीं संग्रहालय मिले
तो कुछ नमूने के तौर पर रख लेना
ताकि कल यह कह सकेंगे
कि सीधे सादे लोग ऐसे होते थे
लोगों का क्या
उनका काम है कहना ।
भास्कर जोशी

शराब ले लो रे शराब


जी हां अब इसी अंदाज में उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में शराब मिलेगी। शराबियों को अब मंदिर (मदिरालय) जाने की जरूरत नहीं । अब उन्हें मंदिर के बहार लंबी लंबी लाइन लगाने की जरुरत नहीं । सूत्रों के हवाले से त्रिवेन्द्र रावत जी ने कहा है कि हमने मदिरालय के कर्मचारियों को आदेश दिया है  कि अब  जनता  पास वे  अपने वाहन लेकर खुद हाजिर होंवें ।

रावत जी ने जनता को आस्वस्त करते हुए  कहा कि  आपको मंदिर में लाइन लगवाने की जरूरत नहीं। आप लोग दूर दराज गांवों से आकर लंबा इंतजार करना पड़ता है। पर अब ऐसा नहीं होगा। हम आपको परेशान नहीं होने देंगे। हम आपके दुःख दर्द को समझते हैं भला आपको परेशान होते हुए कैसे देख सकते हैं

यह तो हमारी सरकार की प्राथमिकता है कि हम घर घर तक शराब पहुंचाएंगे। इससे राज्य का ही नहीं देश का भी मान बढ़ेगा। इस से कई लोगों को रोज़गार मिलेगा। हर शहर और ग्रामीण इलाकों में ड्राइवर और शराब बेचने वालों की वैकेन्सी खुलेगी।  अभी तो हम  सिर्फ वाहन के जरिये पहुँचा रहे  है। अगर सरकार को फायदा होते हुए दिखा तो हम पोस्ट मैन की तरह आपके घर तक शराब की बोतलें  पहुंचाएंगे।

इसी कड़ी में कुछ दिनों बाद आप ऑनलाइन डिमांड भी कर सकेंगे। फिलहाल अभी वाहन द्वारा ही शराब पहुंचाने का कार्य शुरू किया है। जैसे जैसे यह ग्रोथ करेगा , वैसे वैसे सुविधाएँ बढ़ती जायेगी।  बहरहाल  पीने वाले अभी रोड में खड़े रहें। मदिरालय की गाड़ी बस अभी आती ही होगी। अगर आप समय से रोड पर उपस्थित न रहे तो आपको शराब से वंचित होना पड़ सकता है।

महिलाएं कतई परेशान न होवें। आप लोग भी बढ़ चढ़कर भाग ले सकते हैं । यह सुविधा सिर्फ पुरुषों के लिए ही नहीं महिलाओं के लिए भी लागू कर दिया गया है। हमारी सरकार की नीति स्पष्ट है सबका साथ सबका विकास। आपके द्वारा लिया गया शराब का  बोतल देश के काम आएगा। हमारे लिए देश सर्वोपरि है। आप नहीं।

भास्कर जोशी

दलित राष्ट्रपति : भीकू दा से सीधी बात



भीकू दा बहुत समय बीत गया । आपसे मुलाकात न हुई और न ही कोई इंटरव्यू। अभी आप मिले हैं तो क्या एक इंटरव्यू हो जाए ?

भाई आप तो टीआरपी के मौताज हैं और मुझ  पर लट्ठ बरसाने की फिराक में भी। आप तो मेरे कहे हुवे को छपा देंगे परंतु उसके बाद जो धमकियाँ आने लगती हैं वह मैं ही जानता हूँ आप तो साफ़ बच जाएंगे। फिर भी कोशिश करता हूँ आपके सवालों के जवाब दे सकूँ।

धन्यवाद भीकू दा! अच्छा कुछ दिनों बाद राष्ट्र पति का चुनाव होने जा रहा है कौन बनेगा नया राष्ट्रपति?

ले भाई ! कर दी ना देश द्रोह वाली बात। केंद्र में बैठी नई सरकार व् उसके संगठन के कार्यकर्त्ता ही देश भक्त हैं यदि उनके नीति और नियत पर प्रश्न किया तो आप देश द्रोही कहलायेंगे। अगर मैं यह कहूँ कि इसबार राष्ट्रपति का चुनाव नहीं हो रहा बल्कि दलित पति का चुनाव हो रहा है तो यही लोग मुझे देश द्रोही कह डालेंगे।

दलित पति का चुनाव कैसे ?  यह तो भारत के राष्ट्रपति का चुनाव है ना ?

जरूर यह भारत के राष्ट्रपति का चुनाव है इसमें ना ही धर्म आड़े आता है न ही जाती न ही पंथ । लेकिन मौजूदा राष्ट्रपति चुनाव में पक्ष और विपक्ष दलित कार्ड का सहारा लेकर वोट बैंक की राजनीति को महत्व दे रहा है। उन्हें राष्ट्रपति से अधिक दलित पति की आवश्यकता है न की राष्ट्रपति की।

तो क्या दलितों को राष्ट्रपति बनने का अधिकार नहीं?

ऐसा नहीं है भईया? सबको बराबर अधिकार है। लेकिन दलित नाम लेकर जनभावनों से खेलना कहाँ तक उचित है। अगर राष्ट्रपति पद के लिए कोई भी सक्षम हो तो उन्हे राष्ट्रपति बनाना चाहिए । चाहे वह किसी भी धर्म जाती का हो। न ही दलित दलित दलित कर शेष धर्म जाती को बांटना चाहिए। यह एक किस्म का बंटवारा है जो कभी ब्राह्मण तो कभी मुश्लिम तो कभी दलित के सहारे चल रहे हैं । ऐसे में आम जनता असहज महसूस करती है।  साथ ही मीडिया को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि वे किस प्रकार से जन भावनाओं से खेल रहे हैं। राष्ट्रपति के लिए दलित व्यक्ति सक्षम हो तो उनके कामों के जरिये  उन्हें वह अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए न कि जाति पंथ के आधार पर।
भास्कर जोशी।

मेरे गांव के बात

मेरे गांव के बाट

टेढ़े मेढे बाट
इस बाखली से
उस बखाली तक
घर तक छोड़ जाती ।

घने जंगल के बीच
ऊपर नीचे आडी तिरछी
इस गधेरे से
उस गधेरे के छोर तक
आसानी से पहुँचा जाती।

अब तो आँखें बंद कर भी
उन्ही बाट बट्योरों की छवि दिखती है
सपने  में भी उन्हीं पगडंडियों पर
चलता हुवा खुद को पाता हूँ ।
 भास्कर

मेढकों की महासभा



पास से गुज़र रहा था, वहाँ पर देखा कि बहुत से बड़े-बड़े दल-दल थे। उन दल दलों में अपार मेढकों की संख्या। ताज्जुब करने वाली बात यह रही कि वे सभी मेंढक इंसानी भाषा में बात कर रहे थे। उनकी टर टराने की आवाज मेरी कानों में बहुत तेजी से आ रही थी। शोर गुल इतना कि कान बंद करने की नौबत आ पड़ी। कान में दोनों उंगुलियों को घुषोडने के बाद भी उनकी आवाज फिर भी आ ही रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उनकी सभा चल रही हो  और वे टिकट बंटवारे के लिए नोक झोक के साथ साथ छिना झपटी भी कर रहे हो।

मन किया इन मेढकों को जरा सुना जाय। पता तो चले कि मेढक क्या बात करते हैं। मैंने भी अपने कानों से दोनों उंगलियां बहार निकाल ली। पास ही एक पत्थर पर बैठ गया और उनकी कलाबाजी देखने लगा।परन्तु उनकी  नजर जैसे ही मुझ पर पड़ी वे सभी एकदम सुन्न, मानो सन्नाटा छा गया, सभी दल-दल की गहराई में जा छुपे। मैं फिर भी ताकता रहा , क्या पता कुछ मजेदार बात निकालकर आये, और मुझे भी मिर्च मशला मिल जाए। इतने में एक मेढक दल दल से  मुंडी बहार निकालते हुए कुछ अजीब सी आवाज निकालने लगा कि सारे मेढक, एक एक कर दल दल से अपनी मुंडी दिखाने लगे।  उन में से एक मेढक पूरा का पूरा बहार निकल आया और बाकियों ने सिर्फ मुंडी ही बहार निकाल रखी थी।  बहार निकलने वाला बड़ा सा मेढक सबसे टॉप पर बैठ गया।वहां से  टरटराते हुए वह सभी को संबोधित कर रहा था । बाकि के मेढक उसी की ओर देखकर बड़ी शांतिपूर्वक सुन रहे थे।

कुछ देर बाद उनके बीच कुछ बातें हुई, टॉप पर बैठा हुआ कुछ पलभर के लिए  जैसे ही चुप हुवा कि देखते ही देखते सभी मेढक शोर मचाने लगे। उनके बीच हाथापाई होने लगी , एक के ऊपर एक चढ़ने लगे। गुस्साये कुछ मेढक इस दल दल से उस दल दल में जाने लगे।  उनकी आवाजाही एक सांप भी बड़ी तल्लीनता से देख रहा था। वह भी मौके की तलाश में था कि जैसे ही इनका ध्यान टर-टराने पर रहेगा, इस दल से उस दल में कूदेंगे तो तैसे ही अबकी बार इस दल-दल में , मैं घुस ही जाऊँगा। मगर सांप पर चील भी नजर गढ़ाए हुए था। वह भी यही सोच रहा था जैसे ही यह सांप बिल से बाहर निकले , सीधे झपट्टा मारूँगा।

इधर मेढकें दल-दल बदलने की  खेल में मस्त थे कि तभी सांप दल -दल में घुस गया। सांप ने दल दल में फुंकार मारते हुए, मेढकों को ढूंढने लगा, इतने में सारे के सारे मेढक गायब।मेंढक दल-दल में दल बनाकर अंडरग्राउण्ड हो गये।  सांप गुस्से से दल दल में फुंकार मार ही रहा था कि चील ने धावा बोल दिया और सांप को ले उडा। सांप दल -दल में अपना थोड़ा बहुत  जहर फैला चुका था। चील को देख मेढकों जान में जान आयी। सभी मेढकों ने चील को सर्जिकल स्ट्राइक के लिए धन्यवाद दिया। इधर दल दल में सांप का विष से छटपटाए मेढकों का टर-टराना फिर से शुरू हो गया।
भास्कर जोशी

उफ़ ! ये गर्मी

उफ़ ! ये ग़र्मी

उफ़! ये गरमी
तपती धरा, हवा संग बहती लू
हौले हौले से ही सही
मगर झील्लाती हुई पहुँची।

घमोरियों संग तनाकसी
रोम रोम से पसीने की धार
हौले हौले से ही सही
मगर बहती हुई निकल चली।

आँखों की परत मुरझाई सी
हौंठ सूखे, सूखे बिन पानी के
हौले हौले से ही सही
मगर लपलपाते हुए जीभ ठंडक दे गयी।

सर्दी का अहसास करना
कल्पनाओं से भी, अभी ओझल लगता है
हौले हौले ही सही
मगर फ़ैक्टरी से निकले बर्फ़
ठंडक का अहसास करा गयी।

ए गरमी तेरी ये मुहब्बत
अब हम सर्दियों में याद किया करेंगे।
धुंद की चादर से जब तू ढक जाएगा
हौले हौले ही सही
मगर छटने का इंतज़ार रहेगा।

भास्कर जोशी

कहानी : देबुली बुआ

देबुली बुआ  कहानी

एक दम मुफट, गाली गलौच तूती करना मानो उनका अधिकार था. पीठ पीछे कुछ न कहती जो भी कहना हो मुह पर फट् दे मारती, लोगों ने भी उसे कम गालियाँ नहीं दीं.  बांज, रान, न जाने और क्या क्या गालियाँ देबुली को सुनने को मिलती रही. देबुली जितनी दबंग किस्म की महिला थी उतनी ही करुना से भरी हुई मातृत्व प्रेम भी था. स्नेह जब उमड़ता तो आखों से अश्रु बह उठते. सारा लाड प्यार उड़ेल देती.

आज जब उसकी अंतिम यात्रा की डोली सजाई जा रही थी. तब उसके रिश्ते नाते, की भीड़ लग रही थी. उसकी अंतिम यात्रा में सभी सम्मलित हो रहे थे. देबुली ने अपना जीवन मायके में ही बिताया था. उसकी शादी की डोली तो मायके से उठी ही थी. पर अंतिम यात्रा की डोली भी मायके से ही उठने को तैयार थी. मायके में उसके साथी रहे भाभी, बहुवें रो रो कर देबुली के किस्से बता रहे थे,- देबुली तू कितनी भाग्यशाली रही, तेरे बाल बच्चे न होते हुए भी आज तेरा भरा पूरा परिवार है, दानों में दान- कन्यादान तू कर गयी, यज्ञों में यज्ञ, श्रीमद्भागवत महापुराण यज्ञ कर गयी. तुझे तो वैकुण्ठ ही प्राप्त होगा. देख तेरा परिवार कितना बड़ा परिवार है तू देख तो सही...............|  

देबुली का जीवन बड़ा ही काँटों भरा रहा. यों ही कोई सोलह सत्रह की उमर रही होगी जब देबुली का ब्याह हुवा था, पति उस समय भारतीय सेना में सिपाही था. छ: महीने भी नहीं हुए थे ब्याह के, कि पति सीमा पर शहीद हो गया और इधर देबुली अभी जवां ही न हुई थी कि उसे विधवा होना पड़ा. अभी उसका बचपना भी ठीक से बीता नहीं था और न जाने विधाता ने उसके साथ इतना बड़ा अत्याचार क्यों किया. वह भगवान को हमेशा कोश्ती रही,

बड़े भाई को इस बात की सूचना मिली तो वे अपने बहन के दुःख में भागी होने चले गये, पर जब वहां पहुँचे, देबुली की स्थिति देखा, अपने आंसुओं को न रोक पाए| देबुली के सास ससुर से बात कर देबुली को अपने साथ ले जाने की बात कही. भाई की लाचारी देख सास ससुर ने भी जाने की आज्ञा दे दी. भला यहां यह करेगी भी क्या जब पति ही न रहा. अभी तो इसका पूरा जीवन पड़ा है.  बड़े भाई देबुली को अपने साथ मायके ले आये.

कुछ अर्शे तक देबुली एक दम शांत रही, न किसी से बात करती न कुछ कहती, समय बीत रहा था तो देबुली भी अब अपने दुखों से धीरे धीरे उभरने लगी, कुछ साल बीत जाने के बाद देबुली की छोटी बहन की शादी तय हुई, बहन की शादी के बाद देबुली सामान्य स्तिथि में आ चुकी थी. सबसे बात चीत करना हंसी मजाक करना, घर के सभी काम में हाथ बटाना, वह सब कुछ करने लगी थी. लेकिन बाद में देबुली की अपने भाई-भाभियों से छोटी-छोटी बातों पर झगडा होने लगा. झगडा इतना बढ़ गया कि देबुली घर छोड़कर अपने बहन के ससुराल पहुंच गयी, खर्चे के लिए उसे अब किसी से रूपये-पैसे मांगने के जरूरत न पड़ती. तब तक देबुली की सिपाही पेंशन लग चुकी थी,

बहन के घर जब पहुचीं, और बहन का हाल देखा तो वह रो पड़ी. जवांई को शराब की बुरी लत लग चुकी थी. दो छोटे छोटे बच्चे थे और एक कोख में पल रहा था. कुछ समय तक देबुली वहां रही, बहन के काम काज में हाथ बटाने लगी. पर जवांई पीए-खाए हालत में घर आता और अपनी पत्नी संग मार पिट करता. बहन की एसी स्थिति देख वह कहाँ चुप रहने वाली थी. वह भी उस झगडे का हिस्सा बनने लगी, जवांइ और बहन की बीच इतना बड़ा झगडा हुवा कि देबुली वहां से छोड़कर अपने मायके लौट आई. भाई के घर पहुँचने के कुछ दिन तक सब कुछ ठीक रहा. कुछ दिन गुजर जाने के बाद वही वाद-विवाद होने लगा. देबुली भी अब दबने के मुंड में नहीं रहती, खुलकर विरोध करती थी,

शहर से जब देबुली का छोटा भाई गाँव पहुंचा, तब बड़े भाई ने देबुली के बारे में वगत कराया. छोटा भाई करता भी तो क्या करता, परन्तु उसने देबुली से कहा जब भी तेरी इच्छा हो मेरे पास शहर चली आना. तेरा छोटा भाई हमेशा तेरे साथ है. तब देबुली बड़े भाई का घर छोड़कर गाँव में ही किसी के यहां किराये पर रहने लगी थी. चार पांच साल तक वह उस घर में किराये पर रही. कुछ दिन बीत जाने के बाद देबुली के नाम एक ख़त पहुंचा, उसमे लिखा था, तुम्हारी बहन के पति नहीं रहे. यह बात जब देबुली के कानों में पड़ी तो वह रोते हुए अपने बड़े भाई के पास पहुंची, भाई होने के नाते उन्हें दुःख तो हुवा पर देबुली के बर्ताव को देख वे कुछ कह नहीं पाए. उनके मन में कहीं कुछ और भी चल रहा था. कहीं उसे भी मायके बुलाने के नौबत न आजाये. यही कारण था की पांच भाइयों में से कोई भी वहां जाने को तैयार नहीं हुआ.

देबुली को अपने बहन की हालत पहले ही देख चुकी थी . जब वह बहन को छोड़ कर आई थी तब दो छोटे छोटे बच्चे बड़ा लड़का और छोटी लड़की ही थे और एक कोख में पल रहा था, बाद के कुछ वर्षों में बहन के चार बच्चे हो चुके थे. बड़ा लड़का था और बाद के तीन लड़कियां.  देबुली को मन ही मन बहन की चिंता सताए जा रही थी. पति जैसा भी हो एक सहारा होता है पति तो आखिर पति होता है. वह इतना तो जान ही चुकी थी, उसने उसी दिन गठरी में चार कपड़े बंधे और बहन के यहां बग़ैर भाइयों को खबर किये चली गयी. बहन का कामकाज भी कुछ कम न था. चार-चार भैंस पाल रखे थे. गाय-बैल सो अलग थे, इधर भाई भी लोक लाज के डर से तीन महीने बाद अपने बहन से मिलने जाते हैं. भाई के वहां पहुँचने पर देबुली के साथ खूब कहा सुनी होती है. तब भाई ने क्षमा मांगते हुए अपनी बहन से कहा- तेरे इस बड़े लड़के की देख-भाल मैं कर लूँगा, मैं भी घर परिवार वाला हूँ, मेरे भी चार छोटे छोटे बच्चे हैं उनके साथ इसे भी अपने बच्चे जैसा रखूँगा. इससे अधिक मैं भी कुछ नहीं कर सकता हूँ .

देबुली के कहने पर बहन ने बड़े बेटे को उनके साथ रवाना कर दिया. कई साल तक देबुली वहीँ बहन के यहां रही वहीँ काम काज संभाला, बहन के बड़े लड़के को व पांचवीं पास करने के बाद उसे वापस बुलवा लिया. और कुछ समय वह वहीँ रही, देबुली के बर्ताव में काफी फर्क आ चूका था व एकदम निर्भीक और झगडालू किस्म की हो चुकी थी. बात-बात में बहन से भी नोक झोक होने लगी.

देबुली के दो भाई शहर में रहते थे. अब वह बारी बारी से कभी वह उनके यहां चली जाती, तो कभी मायके तो कभी बहन के यहां. कई वर्षों तक यह सिलशिला यों ही चलता है, उधर बहन की लड़कियां शादी के योग्य हो गयी थी, बहन का बुलावा आना पर वह बहन के वहां चली गयी. देबुली की पेंशन तो थी ही, तो उका पैसा बैंक में जमा होता रहा, उसी पैसे से उसने बहन ही तीनों लड़कियों की और बड़े लड़के की भी शादी करवाई. समय समय पर अपने भाइयों के बच्चों की शादी के लिए भी देबुली ने पैसों की खूब मदद भी की. जिसे वह अपनी ख़ुशी से देती थी, उस से कभी वापस नहीं मांगती. परन्तु यदि किसी ने एक रुपया भी उससे उधार के रूप में लिया होता, वह एक आना भी न छोडती.

देबुली की उमर भी ढल रही थी. अब इच्छा थी कि वे अपने ससुराल जाकर सबसे मिल लूँ. वह बहन के यहं से विदा लेने के बाद अपने ससुराल में सभी से मिलने पहुंच गयी. तब तक उधर सारा माहौल बदल चूका था. सास ससुर अब रहे नही, देवरानी, जेठानी सभी शहर जा चुके थे. घर के केवाड बंद थे. उस रात वह अपने परिवार बिरादरी के यहां ही रही, वापस लौटना वहां से मुश्किल था. दुसरे दिन वह वहां से लौटते सयम अपने देवरानी और जेठानी का फोन नंबर लेते हुए, मायके लौट आई.  मायके में कुछ दिन बिताने के बाद अपने जेठानी को फोन किया. जेठानी ने भी उसे आने का न्योता दिया.

जेठानी के घर पहुँचने पर वह सभी से मिली, परिवार के बच्चों को भरा पूरा परिवार देख देबुली रोने लेगी. देबुली ने उन सबके सामने अपनी एक इच्छा जाहिर की- कि वह एक बार अपने कुटुम्भ के साथ भागवत कथा करना चाहती है जिसमें आप सभी की भागीदारी जरुरी है. आप लोग मेरे अपने हैं, आप लोगों को ही मुख्य भूमिका निभानी हैं. जेठानी के बड़े बेटे ने इसमें अपनी रूचि और सहमती दोनों व्यक्त की. उसके बाद देबुली वहां से सभी रिस्ते नाते के साथ निमत्रण देते हुए मायके पहुंच गयी. मायके में ही बड़े भाई के बच्चों के देख रेख और गाँव वालों की मदद से भागवत कथा यज्ञ करवाया गया.

देबुली की इतनी उमर हो चुकी थी कि वे अब अपने बुढ़ापे की बीमारी से भी अब जूझने लगी. अस्थमा दिनोदिन बढ़ने लगा था. इलाज के लिए भी वह सभी कुछ कर चुकी थी. पर उसे अब एहसास होने लगा था अब उसका जीवन अधिक समय तक नहीं रहने वाला था. इसलिए मायके लौट आई. उसकी देखभाल उसके बड़े भाई के बहु बेटे कर रहे थे. बहु बेटे अपनी बुवा की देखभाल अपने माँ पिताजी की तरह करते.

बीमारी की अवस्था में देबुली थोडा बोल-चाल की स्थिति में थी. उस दिन सभी रिश्ते नातों से फोन पर बात की और अंतिम भेंट करने की इच्छा व्यक्त की. दुसरे दिन से ही रिश्ते नातों की भीड़ लगनी शुरू हो गयी, और यह हप्ते भर तक चलता रहा, यह देबुली का अपने परिश्रम, त्याग. कर्म का ही फल था कि  उसके अंतिम क्षणों में सभी अपना हक़ बारी-बारी से निभाते आये. उसी बीच एकाएक देबुली का स्वास्थ अधिक बिगड़ गया. सास लेने में तकलीफ काफी होने लगी. दिन ढलने तक सबकी साँसे देबुली बुवा पर ही अटकी हुई थी. सभी देबुली बुवा के इर्दगिर्द ही थे और उस दिन देर रात सबको छोड़ अनितं यात्रा के लिए चल पड़ी.
भास्कर जोशी

दाज्यू देखो धें

दाज्यू देखो धें
कि भल क् बसाई छि
कि भल क् सजाई छि
तल डाना मल डाना
कि हमर पुरखों बसाई छि
देखो धें, कस निसार लागि रै याँ
दाज्यू देखो धें।

कि भल क़ बाखेय छि
कि भल क़ भियार दोपुर बनाई छि
रन्न छि नानतिनाक़, खेलण क़ुदण
कि भल क मिलीझुली परिवार रौंछि
देखो धें, कस निसार लागि रै याँ
दाज़्यू देखो धें।

कि भल क् म्योल लाग छि
कि भल क् रंगत ऑंछि
तुतुरी बजौने नानतिनाक
कि भल क् फुवार लागि रोंछि
देखो धें, कस निसार लागि रै याँ
दाज्यू देखो धें।

कि भल क् नौ धारक पाणी
कि भल क् छ्प-छपी गौ तराण
गागर, कश्यार् लिबेर पनेर जांछि
कि भल क घर भतेर कलश थापी रौंछि
दाज़्यू देखो धें। कस निसार रै याँ
दाज़्यू देखो धें।
भास्कर जोशी

गेवाड़ घाटी